महाराष्ट्र में BJP का ऑपरेशन कमल असफल

 


 



 


महाराष्ट्र में रातोंरात राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी नेता अजित पवार से डील कर भाजपा की सरकार तो बन गई, मगर शक्ति-परीक्षण से पहले ही मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री अजित पवार मैदान छोडक़र चले गए। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उन्हें बुधवार को शाम पांच बजे बहुमत साबित करने का आदेश दिया, लेकिन उन्होंने असमर्थता जताते हुए इस्तीफा दे दिया।


इससे न भाजपा का ऑपरेशन कमल सफल हुआ और न ही अजित पवार का विधायकों को लाने का दावा। बहुमत का जुगाड़ न होता देख आखिरकार फडणवीस ने मंगलवार की शाम साढ़े तीन बजे प्रेस वार्ता कर इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया। फडणवीस से दो घंटे पहले अजित पवार ने इस्तीफा दिया। कुल मिलाकर अजित पवार 78 और देवेंद्र फडणवीस 80 घंटे ही मुख्यमंत्री रह पाए।


शनिवार की सुबह आठ बजे अचानक जब अजित पवार और देवेंद्र फडणवीस ने शपथ ली थी तो इसे भाजपा खेमे की ओर से बड़ा मास्टर स्ट्रोक के रूप में प्रचारित किया गया। सोशल मीडिया पर भी भाजपा समर्थकों की ओर से इस महाउलटफेर नाम देकर तारीफों के पुल बांधे गए। मगर, जैसे ही शरद पवार ने ट्वीट कर सरकार में शामिल होने को अजित पवार का निजी फैसला बताकर राकांपा को इससे अलग कर लिया, उसके बाद से सियासी घटनाक्रम हर घंटे-दो घंटे पर बदलने लगा।


पहले माना जा रहा था कि सरकार बनाने में शरद पवार की भी मौन सहमति है, मगर उन्होंने जिस तरह से शिवसेना और कांग्रेस के साथ लगातार तालमेल बनाए रखा और सोमवार की शाम सात बजे से पांच सितारा होटल में 162 विधायकों की सार्वजनिक परेड करवाई और उन्हें अपने रुख पर कायम रहने का संकल्प दिलाया, उससे ये आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं।


सूत्रों का कहना है कि राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी ने शनिवार को नई सरकार को आनन-फानन में शपथ दिलाने के बाद बहुमत साबित करने के लिए कोई आधिकारिक समय-सीमा तय नहीं की थी। ऐसे में भाजपा को लगता था कि अजित पवार वादे के मुताबिक देर-सबेर बहुमत के लिए जरूरी विधायकों की व्यवस्था कर लेंगे या फिर ऑपरेशन कमल के तहत दूसरे दलों के विधायकों को तोडक़र बहुमत का आंकड़ा जुटा लेंगे।


मगर अनुभवी चाचा शरद पवार की सियासी चालों के आगे भतीजे अजित पवार मात खा गए। संख्या बल का जुगाड़ न हो पाने के बाद भाजपा खेमे में व्हिप के जरिए खेल करने पर भी विचार हुआ। प्रोटेम स्पीकर के जरिए अजित पवार के व्हिप को कानूनी मान्यता दिलाकर सरकार बचाने की संभावनाओं की बातें चलीं। मगर, इस दांव-पेच से केंद्र सरकार, राज्यपाल, विधानसभा से लेकर प्रोटेम स्पीकर की साख पर बड़े सवाल उठते। एक राउंड और सुप्रीम कोर्ट में मामला जाने की आशंका थी। इस कदम से संवैधानिक रूप से छीछालेदर होने की गुंजाइश थी।


पार्टी सूत्रों के मुताबिक, इन सब हालात से गुजरते हुए भाजपा को जल्दबाजी में सरकार बनाने की गलती का अहसास हो चुका था। भाजपा को लगा कि करीब 29 दिन तक सरकार न बनाकर जो जनता की सहानुभूति कमाई थी, वह बिना बहुमत के सरकार बनाने के कारण चली गई। भाजपा को लगा कि अजित पवार की बातों में आकर वह ओवर कॉन्फिडेंस का शिकार हो गई।


अजित पवार की बातों में भाजपा इसलिए भी आई थी कि शरद और सुप्रिया के केंद्र की राजनीति में होने के कारण राकांपा में वही अब तक विधानसभा हैंडल करते रहे। ऐसे में भाजपा को लगा था कि अगर अजित पवार सरकार बनाने के लिए कह रहे हैं तो जरूर विधायक उनके पास होंगे। मगर भाजपा का अजित पवार के सहयोग से सरकार बनाने का दांव आत्मघाती साबित हुआ। पार्टी की साख और रणनीति दोनों पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं।