नकारात्मक भावनाओं को त्याग कर सही मायनों में मनुष्य बन कर जीये - सद्गुरू माता सुदीक्षा महाराज

रिपोर्ट : अजीत कुमार


 



 


स्वयं को मानवीय गुणों से युक्त करें तथा नकारात्मक भावनाओं को त्याग कर सही मायनों में मनुष्य बन कर जीयें। हमारी सारी उपलब्धियां प्रभु पिता परमात्मा की कृपा है और हमें उनका सदु्पयोग करना है। ये उद्गार सद्गुरू माता सुदीक्षा महाराज ने 3-दिवसीय 72वें वार्षिक निरंकारी संत समागम के दूसरे दिन के सत्र में उपस्थित विशाल मानव परिवार को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। इस समागम में भारत के सभी राज्यों तथा दूर-देशों से आए हुए लाखों श्रद्वालुओं तथा अन्य प्रभु-प्रेमी भाग ले रहे हंै। समागम स्थल एक आध्यात्मिक उत्सव स्थल सा प्रतीत हो रहा है।


सद्गुरू माता जी ने अपने विचारों में आगे कहा कि हमारे व्यवहार में विनम्रता अवश्य होनी चाहिए और जो कुछ भी हमें प्राप्त हुआ है, वह इस निरंकार प्रभु की ही देन है। हमें अपने सभी गुणों का सदुपयोग दूसरों के परोपकार में लगाना चाहिए। जैसे एक माचिस की तीली एक दीपक को भी रोशन कर सकती है और किसी के घर को भी जला सकती है। फर्क पड़ता है हमारी सोच एवं कार्य से। हमें सही मायनों में इन्सान बनना है और सदैव इन्सानियत का ही प्रमाण देना है। जैसे हम विभिन्न तरह की वेशभूषा पहनते हैं वैसे हमारे शरीर अलग- अलग हो सकते हैं लेकिन हमारी आत्मा परमात्मा का ही स्वरुप है, निरंकार का अंश ही है और अगर यह परमात्मा की अंश है तो हमारे अंदर गुण भी वैसे ही होने चाहिए।


सन्त निरंकारी मिशन के 90 वर्षों के इतिहास को याद करते हुए उन्होंने कहा कि बाबा बूटा सिंह जी, बाबा अवतार सिंह जी, जगत माता बुद्धवन्ती जी के प्रारंभिक योगदानों के बाद उसी लड़ी में बाबा गुरूबचन सिंह जी तथा राजमाता कुलवन्त कौर जी ने अपने समय में सीमित साधनों का पूरा उपयोग करते हुए न केवल देश के कोने-कोने में अपितु विदेशों में भी इस सत्य की आवाज को फैलाया। साथ ही उन्होंने समाज कल्याण जैसे सादा विवाह, सामाजिक उत्थान के कार्यों में भी अपना योगदान दिया।


सद्गुरु माता जी ने आगे कहा कि हमें इन्सानी जन्म मिला है तो गुण भी वैसे ही होने चाहिए। हमारे मन के भाव भी इन्सानियत के प्रमाण दें और कोई भी विपरीत भाव जैसे जाति - पाति, ऊँच-नीच इत्यादि मन में नहीं आयें।


सद्गुरु माता ने निरंकारी भक्तों का आह्वान करते हुए कहा कि संतों की सिखलाई को हमने जीवन में उतारना है और साथ ही यह ज्ञान रुपी रोशनी अपने तक सीमित न रखते हुए इससे दूसरों को भी रोशन करना है, दूसरों को भी प्रेरणा देनी है। प्रेरणा केवल बोलों से नहीं, बल्कि अपने व्यावहारिक जीवन द्वारा, मीठे बोलों द्वारा, दूसरों के आँसू पोछते हुए, सांत्वना देते हुए हमने इस रोशनी को हर किसी तक ले जाना है।