उपराष्ट्रपति ने समावेशी विकास के लिए मजदूरों और किसानों की क्रय शक्ति बढ़ाने पर जोर दिया

रिपोर्ट : अजीत कुमार


 



 


उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने कहा कि मजदूर और किसान न केवल अपनी कड़ी मेहनत से अर्थव्यवस्था में योगदान करते हैं, बल्कि वे उपभोक्ताओं के रूप में भी अर्थव्यवस्था में मांग पैदा करते हैं। इसलिए समावेशी विकास को अधिक रफ्तार प्रदान करने के लिए उनकी क्रय शक्ति को बढ़ाना आवश्यक है।


दिल्ली में दत्तोपंत ठेंगड़ी की 100वीं जयंती पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए नायडू ने एक स्थिर एवं समावेशी अर्थव्यवस्था बनाने के लिए संसाधनों के समान वितरण का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कुछ हाथों में धन का संचय अर्थव्यवस्था में असंतुलन और समाज में आक्रोश पैदा करता है।


यह उजागर करते हुए कि धन सृजन के लिए पूंजी और श्रम दोनों महत्वपूर्ण हैं, उपराष्ट्रपति ने इन दोनों के बीच सहयोग एवं सद्भाव का आह्वान किया। उन्होंने धन सृजन में योगदान करने वाले हरेक व्यक्ति का सम्मान करने का भी आह्वान किया चाहे वह श्रमिक हो या प्रबंधक अथवा निवेशक क्योंकि उत्पादन श्रृंखला में इन सभी की महत्वपूर्ण भूमिकाएं हैं।


महात्मा गांधी की ट्रस्टीशिप की अवधारणा का हवाला देते हुए नायडू ने कहा कि धन व्यक्तिगत विलासिता के लिए नहीं होता बल्कि समुदाय के सामूहिक स्वामित्व में हेाता है और इसका उपयोग जनता के कल्याण के लिए किया जाना चाहिए।


वैश्विक आर्थिक बदलावों के बारे में उपराष्ट्रपति ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ मिलकर हम भी अपनी अर्थव्यवस्था को बदल रहे हैं। उन्‍होंने कहा कि पारदर्शी, टिकाऊ, कुशल एवं उच्च वृद्धि वाली समावेशी अर्थव्यवस्था के लिए नई विधायी संरचना तैयार हो रही है। यह देखते हुए कि भारत स्टार्ट-अप का तीसरा सबसे बड़ा गढ़ है, उन्होंने कहा कि हमारी अर्थव्यवस्था में नए स्टार्ट-अप अभिनेता उभर रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि हम अर्थव्यवस्था में रचनात्मक उथल-पुथल देख रहे हैं।


दत्तोपंत ठेंगडी को एक महान बुद्धिजीवी और कर्मयोगी बताते हुए नायडू ने कहा कि उन्होंने देश में सबसे दमदार राष्ट्रवादी श्रम संगठन का खड़ा किया। उन्होंने कहा, 'उल्लेखनीय है कि उन्होंने कभी भी बंद का आह्वान नहीं किया और कभी भी व्यापार संघ को हिंसा में शामिल नहीं किया।'


चौथी औद्योगिक क्रांति की बात करते हुए उपराष्ट्रपति ने श्रम संगठनों और किसानों को इस नई चुनौती के लिए तैयार करने का आह्वान किया। उन्‍होंने कहा, 'भारतीय मजदूर संघ और भारतीय किसान संघ जैसी संस्थाओं को विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों के बारे में जागरूकता फैलानी चाहिए और श्रमिकों एवं किसानों को नई तकनीकों में प्रशिक्षित करना चाहिए।'


ठेंगडी को एक प्रेरणादायक व्यक्ति बताते हुए नायडू ने कहा कि उनके लिए राष्ट्रवाद का मतलब सभी तबकों की राय लेना और उनके हितों के बारे में विचार करना था। उन्होंने कहा, 'उन्होंने कभी भी वर्ग- द्वेष और वर्ग-संघर्ष में विश्वास नहीं किया और उन्‍होंने वर्ग की कई धारणा को अप्रासंगिक बताया।'


दत्तोपंत ठेंगड़ी द्वारा स्‍थापित विभिन्न संगठनों जैसे- अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत, भारतीय अधिवक्‍ता संघ और संस्कार भारती- के बारे में बताते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र केवल वोट डालने तक सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि लोगों को राष्ट्रीय मामलों में भी सक्रिय तौर पर शामिल होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे संगठन लोगों की आकांक्षाओं को रचनात्मक स्वर देने में मदद करते हैं।


इस अवसर पर उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों में गुजरात के पूर्व राज्यपाल और दत्तोपंत ठेंगडी जनम शताब्दी समाज समिति के अध्‍यक्ष प्रो. ओम प्रकाश कोहली, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संयुक्त महासचिव दत्तात्रेय होसाबले, भारतीय किसान संघ के महासचिव बद्री नारायण, भारतीय मजदूर संघ के अध्यक्ष सी. के. सजी नारायणन और स्वदेशी जागरण मंच के आयोजन सचिव सतीश शामिल थे।