शिक्षा को छात्रों में नवाचार की प्रबल इच्छा उत्पन्न करने वाली बनाया जाना चाहिए : उपराष्ट्रपति

 


 



 


उपराष्ट्रपति एम. वेकैंया नायडु ने कहा कि शिक्षा को छात्रों में न केवल वैज्ञानिक भावना और उद्यमियता के प्रयासों को बढ़ावा देना चाहिए, बल्कि उनमें नवाचार करने की  प्रबल इच्छा भी उत्पन्न करनी चाहिए।   


देहरादून में पेट्रोलियम और ऊर्जा शिक्षा विश्वविद्यालय (यूपीईएस) के 17वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए नायडु ने तकनीकी संस्थाओं में उद्यमिता शिक्षा प्रदान करने का आह्वान किया, ताकि बड़ी संख्या में स्नातक केवल नौकरी की तलाश करने वाले न बनें, बल्कि उनमें कारोबार, नौकरियां और धन का सृजन करने के कौशल और विश्वास भी मौजूद हों।


उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की वृद्धि की रफ्तार निरंतर स्थिर बने रहने और विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कहीं अधिक होने के कारण विश्व आज तेजी से अपना ध्यान भारत की ओर केन्द्रित कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारत को बड़ी तादाद में युवा आबादी होने का भी लाभ मिल रहा है और उसकी 50 प्रतिशत जनसंख्या 25 वर्ष से कम आयु की है।  


उन्होंने कहा कि यदि समावेशी एवं सतत वृद्धि तथा विकास के लिए इस जनसांख्यिकीय लाभांश का इस्तेमाल करना और इसका लाभ उठाना है, तो हमारे युवाओं को क्षेत्र विशेष पर केंद्रित शिक्षा, कौशल और विशेषज्ञता से लैस करना होगा।


हमारे युवा स्नातकों की रोजगारपरकता के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए नायडु ने छात्रों को भविष्य के लिए तत्‍पर पेशेवर बनने के लिए विश्वविद्यालयों और उद्योग जगत से एकजुट होने का आग्रह किया।


यह देखते हुए कि नियमित नौकरियों की जगह अब कृत्रिम बौद्धिकता और स्वचलन लेता जा रहा है, उपराष्ट्रपति ने शिक्षण संस्थानों से जल्दी से इस सांचे में ढलने और विकसित होने का अनुरोध किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि विश्वविद्यालयों को छात्रों को ऐसे कार्यों को करने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए, जिन्हें मशीनें नहीं कर सकतीं।


उन्होंने शिक्षण संस्थानों को रटने वाली शिक्षण पद्धति को त्यागने और विविध प्रकार की जानकारी, समस्याओं के समाधान, निर्णय लेने और विश्लेषण का समावेश करने पर अधिक ध्यान देने की सलाह दी। उन्होंने कहा, "स्कूलों में डिजिटल कौशल के साथ-साथ सोचने-समझने के सिद्धांतों को पेश किया जाना चाहिए"। चौथी औद्योगिक क्रांति आसन्न होने को देखते हुए उन्होंने शिक्षण संस्थानों से ज्ञान और कौशल प्राप्त करने का अनुरोध किया, ताकि लंबी छलांग लगाई जा सके।  


नायडु ने इस बात पर जोर दिया कि भारत को समूची शिक्षा प्रणाली के बारे में पुनर्विचार करने की जरूरत है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि हम नवाचार नहीं करेंगे तो हमारे पीछे छूट जाने का खतरा है। अतीत में भारत के 'विश्वगुरू' के दर्जे का उल्लेख करते हुए नायडु ने भारतीय विश्वविद्यालयों से देश को एक बार फिर से वैश्विक ज्ञान का केन्द्र बनाने के लिए कड़ा प्रयत्न करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारतीय विश्वविद्यालयों को स्वयं को विश्व की शीर्ष 100 संस्थाओं के बीच स्थान पाने का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए।


सरकार की ओर से की गई निष्ठा, अर्पित और ध्रुव जैसी अनेक पहलों का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने चेताया कि अकेले सरकार के प्रयासों से विश्वस्तरीय शिक्षा प्रणाली का सृजन करने में सफलता नहीं मिलेगी। उन्होंने कहा, 'हमारी प्रत्येक संस्था को, सरकारी और निजी दोनों को सरकार के साथ तालमेल कायम करके काम करना होगा।'


उन्होंने राय व्यक्त की कि केवल अकादमिक रूप से दक्ष स्नातक तैयार करना ही पर्याप्त नहीं है। नायडु ने कहा कि छात्रों में केवल ज्ञान संबंधी कौशलों को ही विकसित नहीं करना चाहिए, बल्कि उनमें सांस्कृतिक जागरूकता और समानानुभूति, दृढ़ता और धैर्य, टीम वर्क और नेतृत्व सहित सामाजिक और भावनात्मक 'सॉफ्ट स्किल' भी विकसित करने पर जोर दिया जाना चाहिए।


उपराष्ट्रपति ने कहा कि सांस्कृतिक रूप से, भारत जीवन के सभी क्षेत्रों में महान विविधता का पालना रहा है और विश्व धरोहरों के लिए इन समृद्ध विरासतों का न केवल पोषण और संरक्षण किया जाना चाहिए बल्कि इन्हें समृद्ध भी किया जाना चाहिए।


उन्होंने विश्वविद्यालयों से सिद्धांत और व्यवहार के बीच की खाई को पाटने तथा देश और विदेशों में उद्योगों, आर एंड डी प्रयोगशालाओं के साथ नेटवर्किंग करके शोध को बढ़ावा देने का प्रयास करने का आग्रह किया।


उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की ताकत उसके युवाओं में है, जो उसे एक प्रमुख आर्थिक और तकनीकी शक्ति में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उपराष्ट्रपति ने उनसे अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को याद रखने तथा भारत की जनता को तकनीकी प्रगति के लाभ प्रदान करने को कहा।


इस अवसर पर उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों में उत्तराखंड की राज्यपाल बेबी रानी मौर्य, उत्तराखंड  के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, उत्तराखंड के शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत, यूपीईएस के कुलपति डॉ. एस.जे. चोपड़ा और विश्वविद्यालय के उप-कुलपति डॉ. दीपेंद्र कुमार झा शामिल थे।